Friday, 7 March 2014

तावीज़

एक बार एक राजा की सेवा से प्रसन्न होकर एक साधू नें उसे एक ताबीज दिया और कहा की राजन इसे अपने गले मे डाल लो और जिंदगी में कभी ऐसी परिस्थिति आये की जब तुम्हे लगे की बस अब तो सब ख़तम होने वाला है, परेशानी के भंवर मे अपने को फंसा पाओ, कोई प्रकाश की किरण नजर ना आ रही हो, हर तरफ निराशा और हताशा हो तब तुम इस ताबीज को खोल कर इसमें रखे कागज़ को पढ़ना, उससे पहले नहीं.

राजा ने वह ताबीज अपने गले मे पहन लिया. एक बार राजा अपने सैनिकों के साथ शिकार करने घने जंगल मे गया. एक शेर का पीछा करते करते राजा अपने सैनिकों से अलग हो गया और दुश्मन राजा की सीमा मे प्रवेश कर गया, घना जंगल और सांझ का समय, तभी कुछ दुश्मन सैनिकों के घोड़ों की टापों की आवाज राजा को आई
और उसने भी अपने घोड़े को एड लगाई, राजा आगे आगे दुश्मन सैनिक पीछे पीछे. बहुत दूर तक भागने पर भी राजा उन सैनिकों से पीछा नहीं छुडा पाया. भूख प्यास से बेहाल राजा को तभी घने पेड़ों के बीच मे एक गुफा सी दिखी, उसने तुरंत स्वयं और घोड़े को उस गुफा की आड़ मे छुपा लिया. और सांस रोक कर बैठ गया, दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज धीरे धीरे पास आने लगी. दुश्मनों से घिरे हुए अकेले राजा को अपना अंत नजर आने लगा, उसे लगा की बस कुछ ही क्षणों में दुश्मन उसे पकड़ कर मौत के घाट उतार देंगे.
वो जिंदगी से निराश हो ही गया था, की उसका हाथ अपने ताबीज पर गया और उसे साधू की बात याद आ गई .उसने तुरंत ताबीज को खोल कर कागज को बाहर निकाला और पढ़ा. उस पर्ची पर लिखा था —”यह भी कट जाएगा “
राजा को अचानक ही जैसे घोर अन्धकार मे एक ज्योति की किरण दिखी, डूबते को जैसे कोई सहारा मिला. उसे अचानक अपनी आत्मा मे एक अकथनीय शान्ति का अनुभव हुआ. उसे लगा की सचमुच यह भयावह समय भी कट ही जाएगा, फिर मे क्यों चिंतित होऊं. अपने प्रभु और अपने पर विश्वासरख उसने स्वयं से कहा की हाँ, यह भी कट जाएगा. और हुआ भी यही, दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज पास आते आते दूर जाने लगी ,कुछ समय बाद वहां शांति छा गई. राजा रात मे गुफा से निकला और किसी तरह अपने राज्य मे वापस आ गया.
दोस्तों, यह सिर्फ किसी राजा की कहानी नहीं है यह हम सब की कहानी है .हम
सभी परिस्थिति, काम, तनाव के दवाव में इतने जकड जाते हैं की हमे कुछ
सूझता नहीं है, हमारा डर हम पर हावी होने लगता है, कोई रास्ता, समाधान दूर दूर तक नजर नहीं आता, लगने लगता है की बस, अब सब ख़तम, है ना?

तोल मोल के बोल

हॉस्पिटल में एक डॉक्टर बड़ी ही तेजी से घुसा, उसे किसी एक्सीडेंट के मामले में तुरंत बुलाया गया था. अंदर घुसते ही उसने देखा कि जिस लड़के का एक्सीडेंट हुआ है उसके परिजन बड़ी बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रहे हैं.

डॉक्टर को देखते ही लड़के का पिता बोला, ”आप लोग अपनी ड्यूटी ठीक से क्यों नहीं करते? आपने आने में इतनी देर क्यों लगा दी? अगर मेरे बेटे को कुछ हुआ तो इसके जिम्मेदार आप होंगे.”

डॉक्टर ने विनम्रता कहा, ” क्षमा कीजिये, मैं हॉस्पिटल में नहीं था, और फ़ोन आने के बाद जितना तेजी से हो सका मैं यहाँ आया हूँ. कृपया अब आप लोग शांत हो जाइये ताकि मैं इलाज कर सकूँ.”

“शांत हो जाइये?”, लड़के का पिता गुस्से में बोला, ”क्या इस समय अगर आपका बेटा होता तो आप शांत रहते ? अगर किसी  की लापरवाही की वजह से आपका अपना बेटा मर जाए तो आप क्या करेंगे?” ; पिता बोले ही जा रहा था.

”भगवान चाहेगा तो सब ठीक हो जाएगा, आप लोग दुआ कीजिये मैं इलाज शुरू करता हूँ.” और ऐसा कहते हुए डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में प्रवेश कर गया.

बाहर लड़के का पिता अभी भी बडबडा रहा था, ”सलाह देना आसान होता है, जिस पर बीतती है वही जानता है…”

काफी देर बाद डॉक्टर बाहर निकला और मुस्कुराते हुए बोला, ”भगवान् का शुक्र है आपका बेटा अब खतरे से बाहर है.“

यह सुनते ही लड़के के परिजन खुश हो गए और डॉक्टर से सवाल पर सवाल पूछने लगे, ” वो कब तक पूरी तरह से ठीक हो जायेगा? उसे डिस्चार्ज कब करेंगे?” परन्तु डॉक्टर जिस तेजी से आया था उसी तेजी से वापस जाने लगा और लोगों से अपने सवाल नर्स से पूछने को कहा.

”ये डॉक्टर इतना घमंडी क्यों है, ऐसी क्या जल्दी है कि वो दो मिनट हमारे सवालों का जवाब नहीं दे सकता ?” लड़के के पिता ने नर्स से कहा.

नर्स बोली, ” आज सुबह डॉक्टर साहब के लड़के की एक भयानक एक्सीडेंट में मौत हो गयी, और जब हमने उन्हें फ़ोन किया था तब वे उसका अंतिम संस्कार करने जा रहे थे. और बेचारे अब आपके बच्चे की जान बचाने के बाद अपने लाडले का अंतिम संस्कार करने के लिए वापस लौट रहे हैं.“ यह सुन लड़के के परिजन और पिता स्तब्ध रह गए और उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया.

दोस्तों! कई बार हम किसी परिस्थिति के बारे में अच्छी तरह जाने बिना ही उसपर प्रतिक्रिया कर देते हैं. पर हमें चाहिए कि हम खुद पर नियंत्रण रखें और पूरी स्थिति को समझे बिना कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया न दें. वर्ना अनजाने में हम उसे ही ठेस पहुंचा सकते हैं जो हमारा ही भला सोच रहा हो.

शेर या लोमड़ी

एक बौद्ध भिक्षुक भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियाँ चुन रहा था कि तभी उसने कुछ अनोखा देखा, “कितना अजीब है ये.”, उसने बिना पैरों की लोमड़ी को देखते हुए मन ही मन सोचा.

“आखिर इस हालत में ये जिंदा कैसे है?” उसे आशचर्य हुआ, “ और ऊपर से ये बिलकुल स्वस्थ है”

वह अपने ख़यालों में खोया हुआ था की अचानक चारो तरफ अफरा– तफरी मचने लगी; जंगल का राजा शेर उस तरफ आ रहा था. भिक्षुक भी तेजी दिखाते हुए एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया, और वहीँ से सब कुछ देखने लगा.

शेर ने एक हिरन का शिकार किया था और उसे अपने जबड़े में दबा कर लोमड़ी की तरफ बढ़ रहा था, पर उसने लोमड़ी पर हमला नहीं किया बल्कि उसे भी खाने के लिए मांस के कुछ टुकड़े डाल दिए.

“ ये तो घोर आश्चर्य है, शेर लोमड़ी को मारने की बजाये उसे भोजन दे रहा है.”, भिक्षुक बुदबुदाया,उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था इसलिए वह अगले दिन फिर वहीँ आया और छिप कर शेर का इंतज़ार करने लगा. आज भी वैसा ही हुआ, शेर ने अपने शिकार का कुछ हिस्सा लोमड़ी के सामने डाल दिया.

“यह भगवान् के होने का प्रमाण है.” भिक्षुक ने अपने आप से कहा. “वह जिसे पैदा करता है उसके भोजन का भी इंतजाम कर देता है, आज से इस लोमड़ी की तरह मैं भी ऊपर वाले की दया पर जीऊंगा, इश्वर मेरे भी भोजन की व्यवस्था करेगा.” और ऐसा सोचते हुए वह एक वीरान जगह पर जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया.

पहला दिन बीता, पर कोई वहां नहीं आया, दूसरे दिन भी कुछ लोग उधर से गुजर गए पर भिक्षुक की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया. इधर बिना कुछ खाए-पीये वह कमजोर होता जा रहा था. इसी तरह कुछ और दिन बीत गए, अब तो उसकी रही सही ताकत भी खत्म हो गयी …वह चलने -फिरने के लायक भी नहीं रहा. उसकी हालत बिलकुल मृत व्यक्ति की तरह हो चुकी थी की तभी एक महात्मा उधर से गुजरे और भिक्षुक के पास पहुंचे.

उसने अपनी सारी कहानी महात्मा जी को सुनाई और बोला, “ अब आप ही बताइए कि भगवान् इतना निर्दयी कैसे हो सकते हैं, क्या किसी व्यक्ति को इस हालत में पहुंचाना पाप नहीं है ?”

“ बिल्कुल है,”, महात्मा जी ने कहा, “ लेकिन तुम इतना मूर्ख कैसे हो सकते हो? तुम ये क्यों नहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उसे शेर की तरह बनते देखना चाहते थे, लोमड़ी की तरह नहीं.!!”

दोस्तों, हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजें जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं. ईश्वर ने हम सभी के अन्दर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियां दी हैं जो हमें महान बना सकती हैं, ज़रुरत हैं कि हम उन्हें पहचाने, उस भिक्षुक का सौभाग्य था की उसे उसकी गलती का अहसास कराने के लिए महात्मा जी मिल गए पर हमें खुद भी चौकन्ना रहना चाहिए की कहीं हम शेर की जगह लोमड़ी तो नहीं बन रहे हैं.


पचास का नोट

एक व्यक्ति ऑफिस में देर रात तक काम करने के बाद थका -हारा घर पहुंचा. दरवाजा खोलते ही उसने देखा कि उसका पांच वर्षीय बेटा सोने की बजाये उसका इंतज़ार कर रहा है.

अन्दर घुसते ही बेटे ने पूछा “ पापा, क्या मैं आपसे एक प्रश्न पूछ सकता हूँ?”

“हाँ -हाँ पूछो, क्या पूछना है?” पिता ने कहा.

बेटा - “ पापा, आप एक घंटे में कितना कमा लेते हैं?”

“ इससे तुम्हारा क्या लेना देना… तुम ऐसे बेकार के सवाल क्यों कर रहे हो?” पिता ने झुंझलाते हुए उत्तर दिया.

बेटा - “ मैं बस यूँही जानना चाहता हूँ. Please बताइए कि आप एक घंटे में कितना कमाते हैं?”

पिता ने गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए कहा, “100 रुपये.”

“अच्छा ”, बेटे ने मासूमियत से सर झुकाते हुए कहा -, “पापा क्या आप मुझे 50 रूपये दे सकते हैं?”

इतना सुनते ही वह व्यक्ति आग बबूला हो उठा, “तो तुम इसीलिए ये फ़ालतू का सवाल कर रहे थे ताकि मुझसे पैसे लेकर तुम कोई बेकार का खिलौना या उटपटांग चीज खरीद सको… चुप–चाप अपने कमरे में जाओ और सो जाओ … सोचो तुम कितने स्वार्थी हो… मैं दिन रात मेहनत करके पैसे कमाता हूँ और तुम उसे बेकार की चीजों में बर्वाद करना चाहते हो”

यह सुन बेटे की आँखों में आंसू आ गए… और वह अपने कमरे में चला गया.

व्यक्ति अभी भी गुस्से में था और सोच रहा था कि आखिर उसके बेटे कि ऐसा करने कि हिम्मत कैसे हुई… पर एक -आध घंटा बीतने के बाद वह थोडा शांत हुआ, और सोचने लगा कि हो सकता है कि उसके बेटे ने सच -में किसी ज़रूरी काम के लिए पैसे मांगे हों, क्योंकि आज से पहले उसने कभी इस तरह से पैसे नहीं मांगे थे.

फिर वह उठ कर बेटे के कमरे में गया और बोला, “ क्या तुम सो रहे हो?”, “नहीं” जवाब आया.

“मैं सोच रहा था कि शायद मैंने बेकार में ही तुम्हे डांट दिया, दरअसल दिन भर के काम से मैं बहुत थक गया था.” व्यक्ति ने कहा.

“I am sorry… ये लो अपने पचास रूपये.” ऐसा कहते हुए उसने अपने बेटे के हाथ में पचास की नोट रख दी.

“Thank You पापा” बेटा ख़ुशी से पैसे लेते हुए कहा, और फिर वह तेजी से उठकर अपनी आलमारी की तरफ गया, वहां से उसने ढेर सारे सिक्के निकाले और धीरे -धीरे उन्हें गिनने लगा.

यह देख व्यक्ति फिर से क्रोधित होने लगा, “जब तुम्हारे पास पहले से ही पैसे थे तो तुमने मुझसे और पैसे क्यों मांगे?”

“क्योंकि मेरे पास पैसे कम थे, पर अब पूरे हैं” बेटे ने कहा.

“पापा अब मेरे पास 100 रूपये हैं. क्या मैं आपका एक घंटा खरीद सकता हूँ? आप ये पैसे ले लोजिये और कल घर जल्दी आ जाइये, मैं आपके साथ बैठकर खाना खाना चाहता हूँ.”

दोस्तों, इस तेज रफ़्तार जीवन में हम कई बार खुद को इतना व्यस्त कर लेते हैं कि उन लोगो के लिए ही समय नहीं निकाल पाते जो हमारे जीवन में सबसे ज्यादा महत्त्व रखते हैं. इसलिए हमें ध्यान रखना होगा कि इस आपा-धापी में भी हम अपने माँ-बाप, जीवन साथी, बच्चों और अभिन्न मित्रों के लिए समय निकालें, वरना एक दिन हमें भी अहसास होगा कि हमने छोटी-मोटी चीजें पाने के लिए कुछ बहुत बड़ा खो दिया.