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Monday, 17 November 2014
Tuesday, 11 March 2014
विद्या ददाति विनयम्
एक स्टेशन पर एक
युवक छोटा सा सूटकेस हाथ में लेकर ट्रेन से उतरा. उतर कर वह कुली ढूंढने लगा. कुली-कुली उसने कई आवाजें लगाई, परंतु कोई कुली नहीं आया. उस युवक के साथ एक अन्य व्यक्ति भी ट्रेन से उतरा.
उसने जब देखा कि युवक एक बहुत ही छोटे से सूटकेस को उठाने के लिए कुली ढूंढ
रहा है तो उसकी मदद के लिए गया कि शायद युवक को कुछ स्वास्थ्य संबंधी
परेशानी होगी, जिसके
कारण वह छोटे से
सूटकेस को ढोने के लिए भी कुली ढूंढ रहा है.
उस व्यक्ति ने युवक से पूछा – आप इस जरा से सूटकेस को उठाने के लिए कुली को क्यों ढूंढ रहे हैं?
मैं पढ़ा लिखा व्यक्ति हूँ, और सूटकेस छोटा हो या बड़ा इसे तो कुली ही उठाते हैं – युवक ने जवाब दिया.
कुली तो हैं नहीं, यदि तुम्हें कोई समस्या न हो तो मैं इसे उठा कर आप जहाँ कहें पहुँचा देता हूं – उस व्यक्ति ने प्रस्ताव दिया.
युवक सहर्ष राज़ी हो गया. गंतव्य पर पहुँचने पर युवक उस व्यक्ति को मेहनताना देने लगा. मगर उस व्यक्ति ने मना कर दिया.
शाम को वहीं स्टेशन के पास एक सभागार में प्रसिद्ध विद्वान ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भाषण था. सभागार में वह युवक भी पहुँचा. दरअसल वह खासतौर पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भाषण सुनने ही इस शहर में आया था.
उसने देखा कि वह व्यक्ति जिसने उसका बैग उठाया था, और कोई नहीं, ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे!
उस व्यक्ति ने युवक से पूछा – आप इस जरा से सूटकेस को उठाने के लिए कुली को क्यों ढूंढ रहे हैं?
मैं पढ़ा लिखा व्यक्ति हूँ, और सूटकेस छोटा हो या बड़ा इसे तो कुली ही उठाते हैं – युवक ने जवाब दिया.
कुली तो हैं नहीं, यदि तुम्हें कोई समस्या न हो तो मैं इसे उठा कर आप जहाँ कहें पहुँचा देता हूं – उस व्यक्ति ने प्रस्ताव दिया.
युवक सहर्ष राज़ी हो गया. गंतव्य पर पहुँचने पर युवक उस व्यक्ति को मेहनताना देने लगा. मगर उस व्यक्ति ने मना कर दिया.
शाम को वहीं स्टेशन के पास एक सभागार में प्रसिद्ध विद्वान ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भाषण था. सभागार में वह युवक भी पहुँचा. दरअसल वह खासतौर पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भाषण सुनने ही इस शहर में आया था.
उसने देखा कि वह व्यक्ति जिसने उसका बैग उठाया था, और कोई नहीं, ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे!
कर्तव्य-बोध
थुम्बा में रॉकेट
प्रक्षेपण स्टेशन पर वैज्ञानिक एक दिन में लगभग 12 से 18 घंटे के लिए काम करते थे. इस परियोजना पर काम कर रहे वैज्ञानिकों कि संख्या सत्तर के लगभग थी . सभी वैज्ञानिक वास्तव में काम के दबाव और अपने मालिक की मांग के कारण निराश थे, लेकिन हर कोई उससे वफादार था और नौकरी छोड़ने के बारे में नहीं सोचता था .
एक दिन, एक वैज्ञानिक अपने बॉस के पास आया था और उनसे कहा - सर, मैं अपने बच्चों को वादा किया है कि मैं उन्हें हमारी बस्ती में चल रही प्रदर्शनी दिखाने के लिए ले जाऊँगा . तो मैं 5 30 बजे कार्यालय छोड़ना चाहता हूँ .
उनका बॉस ने कहा - ठीक है, तुम्हे आज जल्दी कार्यालय छोड़ने के लिए अनुमति दी जाती है.
वैज्ञानिक ने काम शुरू कर दिया. उसने दोपहर के भोजन के बाद भी अपना काम जारी रखा. हमेशा की तरह वह इस हद तक अपने काम में मशगूल था कि जब उसने अपनी घड़ी में देखा कि समय रात्रि 8.30 बज चुके थे . अचानकउसे अपना वह वादा जो उसने अपने बच्चों को किया था याद आया . उसने अपने मालिक के लिए देखा, वह वहाँ नहीं था. उसे सुबह ही बताया था, उसने सब कुछ बंद कर दिया और घर के लिए चल दिया.
अपने भीतर गहराई में, वह अपने बच्चों को निराश करने के लिए दोषी महसूस कर रहा था.
वह घर पहुंच गया. बच्चे वहाँ नहीं थे पत्नी अकेली हॉल में बैठी थी और पत्रिकाओं को पढ़ने में मशगूल थी . स्थिति विस्फोटक थी , उसे लगा कोई भी बात करने पर वह उस पर फट पड़ेगी . उसकी पत्नी ने उससे पूछा - क्या आप के लिए कॉफीलाऊं या मैं सीधे रात्रिभोज की व्यवस्था करू अगर आप भूखे है आपकी पसंद का भोजन बना है.
आदमी ने कहा - अगर तुम भी पियो तो मैं भी कॉफी लूँगा, लेकिन बच्चे कहां हैं ?? पत्नी ने कहा - आपको नहीं पता है आपका प्रबंधक 5 15 बजे आया और प्रदर्शनी के लिए बच्चों को ले गया.
असल में हुआ क्या था
मालिक ने उसे दी गई अनुमति के अनुसार उसे 5,00 बजे उसे गंभीरता से काम करते देखा और सोचा कि यह व्यक्ति काम को नहीं छोड़ सकता है , लेकिन उसने अपने बच्चों से वादा किया है कि वो उन्हें प्रदर्शनी के लिए लें जाएगा. तो वह उन्हें प्रदर्शनी के लिए लेकर गया.
मालिक ने हर बार यही नहीं किया था पर जो एक बार किया उससे उस वैज्ञानिक कि प्रतिबद्धता हमेशा के लिए स्थापित हो गयी
यही कारण है कि थुम्बा में सभी वैज्ञानिकों ने उनके मालिक के तहत काम जारी रखा जबकि तनाव जबरदस्त था.
क्या आप अनुमान लगा सकते हैं वो मेनेजर कौन था
वो हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री ए पी जे अब्दुल कलाम थे.
एक दिन, एक वैज्ञानिक अपने बॉस के पास आया था और उनसे कहा - सर, मैं अपने बच्चों को वादा किया है कि मैं उन्हें हमारी बस्ती में चल रही प्रदर्शनी दिखाने के लिए ले जाऊँगा . तो मैं 5 30 बजे कार्यालय छोड़ना चाहता हूँ .
उनका बॉस ने कहा - ठीक है, तुम्हे आज जल्दी कार्यालय छोड़ने के लिए अनुमति दी जाती है.
वैज्ञानिक ने काम शुरू कर दिया. उसने दोपहर के भोजन के बाद भी अपना काम जारी रखा. हमेशा की तरह वह इस हद तक अपने काम में मशगूल था कि जब उसने अपनी घड़ी में देखा कि समय रात्रि 8.30 बज चुके थे . अचानकउसे अपना वह वादा जो उसने अपने बच्चों को किया था याद आया . उसने अपने मालिक के लिए देखा, वह वहाँ नहीं था. उसे सुबह ही बताया था, उसने सब कुछ बंद कर दिया और घर के लिए चल दिया.
अपने भीतर गहराई में, वह अपने बच्चों को निराश करने के लिए दोषी महसूस कर रहा था.
वह घर पहुंच गया. बच्चे वहाँ नहीं थे पत्नी अकेली हॉल में बैठी थी और पत्रिकाओं को पढ़ने में मशगूल थी . स्थिति विस्फोटक थी , उसे लगा कोई भी बात करने पर वह उस पर फट पड़ेगी . उसकी पत्नी ने उससे पूछा - क्या आप के लिए कॉफीलाऊं या मैं सीधे रात्रिभोज की व्यवस्था करू अगर आप भूखे है आपकी पसंद का भोजन बना है.
आदमी ने कहा - अगर तुम भी पियो तो मैं भी कॉफी लूँगा, लेकिन बच्चे कहां हैं ?? पत्नी ने कहा - आपको नहीं पता है आपका प्रबंधक 5 15 बजे आया और प्रदर्शनी के लिए बच्चों को ले गया.
असल में हुआ क्या था
मालिक ने उसे दी गई अनुमति के अनुसार उसे 5,00 बजे उसे गंभीरता से काम करते देखा और सोचा कि यह व्यक्ति काम को नहीं छोड़ सकता है , लेकिन उसने अपने बच्चों से वादा किया है कि वो उन्हें प्रदर्शनी के लिए लें जाएगा. तो वह उन्हें प्रदर्शनी के लिए लेकर गया.
मालिक ने हर बार यही नहीं किया था पर जो एक बार किया उससे उस वैज्ञानिक कि प्रतिबद्धता हमेशा के लिए स्थापित हो गयी
यही कारण है कि थुम्बा में सभी वैज्ञानिकों ने उनके मालिक के तहत काम जारी रखा जबकि तनाव जबरदस्त था.
क्या आप अनुमान लगा सकते हैं वो मेनेजर कौन था
वो हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री ए पी जे अब्दुल कलाम थे.
Wednesday, 18 December 2013
चीन का रिक्शावाला
1987 में बाई फंगली नाम का एक रिक्शा-चालक, वर्षों तक मेहनत करने के बाद अपने गाँव वापस आया. अब वह अपने परिवार के साथ बाकी जीवन बिताना चाहता था. गाँव आने के बाद वह यह देख कर बहुत दुखी हुआ कि छोटे-छोटे बच्चे खेतों में मजदूरी कर रहे थे. उन बच्चों के माता-पिता उनकी पढाई का बोझ नहीं उठा सकते थे. उसने मन ही मन एक फैसला लिया.
अगले दिन वह वापस शहर चला गया और रिक्शा चलाना शुरू कर दिया. रेलवे-स्टेशन के पास एक छोटी सी झोंपड़ी में रहता, आधा पेट रूखा सूखा खा कर गुजारा करता और दिन रात मेहनत कर चार पैसे कमाता. वह अपनी मेहनत की सारी कमाई उन गरीब बच्चों की पढाई पर खर्च कर देता था.
300 से भी अधिक बच्चों को पढाई में सहायता करने में बाई ने कुल मिला कर 350,000 युआन खर्च किये. 2005 में अपनी दानशीलता की प्रेरणादायक विरासत छोड़ कर इस दुनिया से विदा ली.
दोस्तों! फाटे पुराने कपड़े पहन कर, आधा पेट भोजन कर, दिन रात रिक्शा चला कर यदि वह 300 से अधिक बच्चों की पढाई का खर्च दे कर उनका जीवन संवार सकता था, तो हम क्या कुछ नहीं कर सकते? यदि हम सब ठान लें तो इस दुनिया की तस्वीर बदल सकते हैं.
अगले दिन वह वापस शहर चला गया और रिक्शा चलाना शुरू कर दिया. रेलवे-स्टेशन के पास एक छोटी सी झोंपड़ी में रहता, आधा पेट रूखा सूखा खा कर गुजारा करता और दिन रात मेहनत कर चार पैसे कमाता. वह अपनी मेहनत की सारी कमाई उन गरीब बच्चों की पढाई पर खर्च कर देता था.
300 से भी अधिक बच्चों को पढाई में सहायता करने में बाई ने कुल मिला कर 350,000 युआन खर्च किये. 2005 में अपनी दानशीलता की प्रेरणादायक विरासत छोड़ कर इस दुनिया से विदा ली.
दोस्तों! फाटे पुराने कपड़े पहन कर, आधा पेट भोजन कर, दिन रात रिक्शा चला कर यदि वह 300 से अधिक बच्चों की पढाई का खर्च दे कर उनका जीवन संवार सकता था, तो हम क्या कुछ नहीं कर सकते? यदि हम सब ठान लें तो इस दुनिया की तस्वीर बदल सकते हैं.
Saturday, 30 November 2013
प्यार का चमत्कार
केरन एक 3 वर्ष के बच्चे की मां, फिर से गर्भवती थी. सोनोग्राफी से पता चला कि उसे इस बार एक बेटी होगी. उसे चिंता थी कि बच्ची के आने पर उसका 3 साल का बेटा माइकल पता नहीं कैसे बर्ताव करेगा. वह बच्ची को स्वीकार करेगा या नहीं? कहीं उसे यह ना लगे कि अब उसके हिस्से का प्यार, माँ बाप नई बच्ची को दे रहे हैं. यह सोच कर उसने अपने बेटे को धीरे-धीरे समझाना शुरू किया कि उसकी एक छोटी बहन आने वाली है. उसने माइकल को इस तरह से समझाया कि वह अपनी आने वाली बहन से बहुत प्यार करने लगा.
और एक दिन माइकल की छोटी बहन का जन्म हुआ. परन्तु वह बहुत बीमार थी इसलिए उसे फ़ौरन नर्सरी में भर्ती करना पड़ा. माइकल अपनी बहन को देखना चाहता था, उसके साथ खेलना चाहता था. केरन बीच-बीच में बच्ची को देखने और दूध पिलाने जाती. नर्सरी में बच्चों का जाना वर्जित होता है, इसलिए बहुत चाहने के बाद भी माइकल अपनी बहन को नहीं देख पा रहा था. वह बहुत दुखी हो गया और ज्यादातर समय रोता रहता था.
बच्ची की हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी. यहां तक कि केरन और उसके पति को लगने लगा कि बच्ची का बचना मुश्किल है. माइकल बार-बार अपने माता पिता से जिद करता कि उसे बहन को देखने जाना है और उसे एक गाना सुनाना है.
केरन को लगा कि यदि उसने अभी उसे अपनी बहन से नहीं मिलाया तो शायद कभी भी नहीं मिला पाएगी. यह सोच कर अगले दिन वह माइकल को नर्सरी में ले गई. वहां ड्यूटी पर तैनात हेड-नर्स ने कहा कि बच्चों को वहां लाने की अनुमति नहीं है.
केरन ने बहुत दृढ़ता के साथ हेड-नर्स से कहा कि, "चाहे कुछ भी हो जाए, वह अपनी बहन को गाना सुनाये बिना वहां से नहीं जाएगा." और वह माइकल को उसकी बहन के पालने के पास ले गई.
बच्ची तड़प रही थी. हाथ-पैर मार रही थी. उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थी. माइकल ने बाल-सुलभ तरीके से गाना शुरू किया. अभी उसने एक दो लाइनें ही गाई थीं, कि बच्ची ने हाथ-पैर मारना कम कर दिया. हेड-नर्स सब देख रही थी. वह उसे गाने से रोकना चाहती थी पर बच्ची की प्रतिक्रिया को देख, उसने माइकल से गाना चालू रखने को कहा. हेड-नर्स की आँखें भी भर आई थी. माइकल गाता रहा. बच्ची की उखड्ती सांसें ठीक होने लगी थी. और देखते-देखते माइकल की बहन बिलकुल शांत हो गई, जैसे उसे बहुत आराम मिला हो. वह टिकटिकी लगाए माइकल को देख रही थी. केरन के चेहरे पर ख़ुशी की आभा छा गई.
अगले ही दिन माइकल की बहन को नर्सरी से छुट्टी मिल गई. डॉक्टर्स ने इसे एक चमत्कार कहा.
यह कहानी Tennessee, USA में 1992 में घटित एक सच्ची घटना पर आधारित है. माइकल की बहन (नीचे चित्र) का नाम मार्ली है.
और एक दिन माइकल की छोटी बहन का जन्म हुआ. परन्तु वह बहुत बीमार थी इसलिए उसे फ़ौरन नर्सरी में भर्ती करना पड़ा. माइकल अपनी बहन को देखना चाहता था, उसके साथ खेलना चाहता था. केरन बीच-बीच में बच्ची को देखने और दूध पिलाने जाती. नर्सरी में बच्चों का जाना वर्जित होता है, इसलिए बहुत चाहने के बाद भी माइकल अपनी बहन को नहीं देख पा रहा था. वह बहुत दुखी हो गया और ज्यादातर समय रोता रहता था.
बच्ची की हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी. यहां तक कि केरन और उसके पति को लगने लगा कि बच्ची का बचना मुश्किल है. माइकल बार-बार अपने माता पिता से जिद करता कि उसे बहन को देखने जाना है और उसे एक गाना सुनाना है.
केरन को लगा कि यदि उसने अभी उसे अपनी बहन से नहीं मिलाया तो शायद कभी भी नहीं मिला पाएगी. यह सोच कर अगले दिन वह माइकल को नर्सरी में ले गई. वहां ड्यूटी पर तैनात हेड-नर्स ने कहा कि बच्चों को वहां लाने की अनुमति नहीं है.
केरन ने बहुत दृढ़ता के साथ हेड-नर्स से कहा कि, "चाहे कुछ भी हो जाए, वह अपनी बहन को गाना सुनाये बिना वहां से नहीं जाएगा." और वह माइकल को उसकी बहन के पालने के पास ले गई.
बच्ची तड़प रही थी. हाथ-पैर मार रही थी. उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थी. माइकल ने बाल-सुलभ तरीके से गाना शुरू किया. अभी उसने एक दो लाइनें ही गाई थीं, कि बच्ची ने हाथ-पैर मारना कम कर दिया. हेड-नर्स सब देख रही थी. वह उसे गाने से रोकना चाहती थी पर बच्ची की प्रतिक्रिया को देख, उसने माइकल से गाना चालू रखने को कहा. हेड-नर्स की आँखें भी भर आई थी. माइकल गाता रहा. बच्ची की उखड्ती सांसें ठीक होने लगी थी. और देखते-देखते माइकल की बहन बिलकुल शांत हो गई, जैसे उसे बहुत आराम मिला हो. वह टिकटिकी लगाए माइकल को देख रही थी. केरन के चेहरे पर ख़ुशी की आभा छा गई.
अगले ही दिन माइकल की बहन को नर्सरी से छुट्टी मिल गई. डॉक्टर्स ने इसे एक चमत्कार कहा.
यह कहानी Tennessee, USA में 1992 में घटित एक सच्ची घटना पर आधारित है. माइकल की बहन (नीचे चित्र) का नाम मार्ली है.
दोस्तों! यह है प्यार की शक्ति. प्यार का चमत्कार.
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