अपनी जवानी के दिनों में एक आदमी दुनिया बदलना चाहता था. कुछ वर्षों बाद जब उसे लगा कि वह दुनिया को नहीं बदल पायेगा तो उसने सोचा चलो मैं अपने देश को ही बदल डालता हूँ. परन्तु कुछ और वर्षों बाद उसे ऐसा लगने लगा देश बदलना तो मुश्किल है, चलो मैं अपने शहर को बदलता हूँ. जब वह शहर को भी नहीं बदल पाया तो सोचा कि चलो शहर नहीं बदल पाया तो क्या, मैं अपने परिवार को तो अवश्य ही बदल सकता हूँ.
आपने ठीक सोचा. वह अपने परिवार को भी नहीं बदल पाया. इस बीच वह बूढ़ा हो गया था.
अब, एक बूढ़े आदमी के रूप में, उसे एहसास हुआ कि मैं केवल अपने आप को बदल सकता हूँ.
वह अपने आप को बदलने का प्रयास करने लगा और उसमें सफल भी रहा.
पर क्या आपको नहीं लगता कि अब बहुत देर हो चुकी थी. यदि बहुत पहले उसने अपने आप को बदला होता, तो इसका प्रभाव उसके परिवार पर पड़ता और परिवार बदल जाता. उसमें और उसके परिवार में बदलाव देख कर शायद उसका मोहल्ला, फिर उसका शहर भी बदल सकता था. इसी तरह धीरे धीरे शायद उसका देश भी बदल जाता और शायद एक दिन दुनिया भी.
दोस्तों! इस कहानी का एक और भी सन्देश है कि कुछ प्रयासों के बाद अधिकतर लोग अपने लक्ष्य को छोटा करते चले जाते हैं और यही सोच आपकी सफलता को रोकती है.
Tuesday, 19 November 2013
Monday, 18 November 2013
पूँछ में आग
एक बार कुछ चिडियां आकाश में उड़ रही थीं. तभी एक हवाई जहाज़ वहां से बहुत तेजी से गुजरा. एक चिड़िया बहुत हैरान हो गई. उसने दूसरी चिड़िया से पूछा, "यह क्या चीज है? यह देखने में तो हमारे जैसा ही लग रहा है. परन्तु यह इतनी तेजी से कैसे उड़ रहा है?"
उसके साथ उड़ रही दूसरी चिड़िया ने कहा, "यह एक हवाई जहाज़ है. और यह भी ठीक है कि यह देखने में हमारे जैसा ही लगता है. परन्तु तुमने शायद देखा नहीं, उसकी पूंछ में आग लगी है. जिस दिन तुम्हारी पूँछ में आग लग जायेगी, तुम उससे भी तेज उड़ पाओगी."
दोस्तों! दूसरी चिड़िया की बात शायद आपको मज़ाक लगेगी? परन्तु यह बिलकुल सच है. पूंछ में आग लगना एक मुहावरा है, जिसका अर्थ है ज्वलंत इच्छा (burning desire) का होना. जब तक कोई इच्छा ज्वलंत-इच्छा नहीं बनती तब तक सफलता नहीं मिलती. जिस किसी को भी सफलता की चाहत है, उसे अपनी पूंछ में आग लगानी पड़ेगी, अर्थात अपनी इच्छा को ज्वलंत-इच्छा बनाना पड़ेगा. यह कहानी कम से कम शब्दों में सफलता का मार्ग दिखाती है.
उसके साथ उड़ रही दूसरी चिड़िया ने कहा, "यह एक हवाई जहाज़ है. और यह भी ठीक है कि यह देखने में हमारे जैसा ही लगता है. परन्तु तुमने शायद देखा नहीं, उसकी पूंछ में आग लगी है. जिस दिन तुम्हारी पूँछ में आग लग जायेगी, तुम उससे भी तेज उड़ पाओगी."
दोस्तों! दूसरी चिड़िया की बात शायद आपको मज़ाक लगेगी? परन्तु यह बिलकुल सच है. पूंछ में आग लगना एक मुहावरा है, जिसका अर्थ है ज्वलंत इच्छा (burning desire) का होना. जब तक कोई इच्छा ज्वलंत-इच्छा नहीं बनती तब तक सफलता नहीं मिलती. जिस किसी को भी सफलता की चाहत है, उसे अपनी पूंछ में आग लगानी पड़ेगी, अर्थात अपनी इच्छा को ज्वलंत-इच्छा बनाना पड़ेगा. यह कहानी कम से कम शब्दों में सफलता का मार्ग दिखाती है.
Friday, 15 November 2013
काम का मूल्यांकन
एक छोटे शहर में एक दुकान के बाहर एक पब्लिक टेलीफोन बूथ था. एक दिन एक लड़का वहां आया और फ़ोन करने लगा. दुकानदार उस समय कुछ खाली था सो उस लड़के की बातें सुनने लगा.
फ़ोन मिलने पर लड़के ने कहा, "नमस्ते मैडम, क्या मुझे आपके यहाँ माली का काम मिल सकता है?"
दूसरी तरफ से महिला ने उत्तर दिया, "परन्तु हमारे पास तो पहले से ही एक माली है."
लड़का बोला, "मैडम मैं उस व्यक्ति से आधी तनख्वाह में भी काम करने को तैयार हूँ."
इस पर महिला ने कहा, "मैं अपने वर्तमान माली के काम से बहुत संतुष्ट हूँ."
लड़के ने अब अधिक दृढ़ता के साथ कहा, "मैडम मैं माली का काम करने के साथ साथ, आपके घर का झाड़ू-पोछा मुफ्त में कर दूंगा."
महिला ने कहा, "नहीं, शुक्रिया."
अपने चेहरे पर एक मुस्कान लिये, लड़के ने फ़ोन का रिसीवर रख दिया. दुकान का मालिक, जो यह सब सुन रहा था, लड़के के पास गया और कहा, "बेटा! मुझे तुम्हारा रवैया बहुत पसंद आया, मुझे लगता है कि तुम्हे नौकरी की सख्त जरूरत है. मैं तुम्हे नौकरी दूंगा."
लड़के ने कहा, "नहीं, धन्यवाद."
इस पर दुकानदार ने कहा, "लेकिन अभी तो तुम नौकरी के लिए विनती कर रहे थे?"
लड़का बोला, "नहीं सर , मैं तो बस अपने काम का मूल्यांकन कर रहा था. इन महिला के यहां मैं ही माली का काम देखता हूँ और जानना चाहता था कि मैं अपना काम ठीक से कर रहा हूँ या नहीं?"
दोस्तों! काम छोटा हो या बड़ा, पूरी निष्ठा एवं इमानदारी से करना चाहिये. साथ ही साथ अपने कार्य का समय समय पर मूल्यांकन भी करते रहना चाहिये.
फ़ोन मिलने पर लड़के ने कहा, "नमस्ते मैडम, क्या मुझे आपके यहाँ माली का काम मिल सकता है?"
दूसरी तरफ से महिला ने उत्तर दिया, "परन्तु हमारे पास तो पहले से ही एक माली है."
लड़का बोला, "मैडम मैं उस व्यक्ति से आधी तनख्वाह में भी काम करने को तैयार हूँ."
इस पर महिला ने कहा, "मैं अपने वर्तमान माली के काम से बहुत संतुष्ट हूँ."
लड़के ने अब अधिक दृढ़ता के साथ कहा, "मैडम मैं माली का काम करने के साथ साथ, आपके घर का झाड़ू-पोछा मुफ्त में कर दूंगा."
महिला ने कहा, "नहीं, शुक्रिया."
अपने चेहरे पर एक मुस्कान लिये, लड़के ने फ़ोन का रिसीवर रख दिया. दुकान का मालिक, जो यह सब सुन रहा था, लड़के के पास गया और कहा, "बेटा! मुझे तुम्हारा रवैया बहुत पसंद आया, मुझे लगता है कि तुम्हे नौकरी की सख्त जरूरत है. मैं तुम्हे नौकरी दूंगा."
लड़के ने कहा, "नहीं, धन्यवाद."
इस पर दुकानदार ने कहा, "लेकिन अभी तो तुम नौकरी के लिए विनती कर रहे थे?"
लड़का बोला, "नहीं सर , मैं तो बस अपने काम का मूल्यांकन कर रहा था. इन महिला के यहां मैं ही माली का काम देखता हूँ और जानना चाहता था कि मैं अपना काम ठीक से कर रहा हूँ या नहीं?"
दोस्तों! काम छोटा हो या बड़ा, पूरी निष्ठा एवं इमानदारी से करना चाहिये. साथ ही साथ अपने कार्य का समय समय पर मूल्यांकन भी करते रहना चाहिये.
Thursday, 14 November 2013
स्वभाव अपना अपना
एक
बूढे आदमी ने एक बिच्छू को डूबते देखा और पानी से बाहर निकलने का फैसला किया. बहुत शांति पूर्वक, बिच्छू तक पहुँचने के लिए, उसने अपना हाथ बढ़ाया और बिच्छू को उठा लिया. बिच्छू ने उसके हाथ पर डंक मार दिया. दर्द के कारण बूढ़े आदमी का हाथ हिला और बिच्छू वापस पानी में गिर गया. बिच्छू को फिर से डूबता देख, उस आदमी ने दुबारा उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन बिच्छू ने उसे फिर से उसे
डंक मार दिया. उस आदमी के हाथ से बिच्छू फिर से छूट गया. एक बार फिर उस आदमी ने बिच्छू को बचाने के लिए हाथ बढाया ही था कि, पास खड़े एक लड़के ने, जो यह सब देख रहा था कहा, "बाबा आप यह क्या कर रहे हैं? आप बार बार इसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि यह दुष्ट बिच्छू बार बार डंक मार कर आपको कष्ट पहुंचा रहा है. आप इसे डूब क्यों नहीं जाने देते?"
बूढ़े आदमी ने बहुत शांतिपूर्वक कहा, "बेटा! बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना और मेरा स्वभाव है मदद करना. जब यह बिच्छू अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता तो भला मैं मनुष्य हो कर अपना स्वभाव कैसे छोड़ सकता हूँ?"
फिर बूढ़े आदमी ने क्षण भर के लिए सोचा और पास के पेड़ से एक पत्ता लेकर, बिच्छू को पानी से बाहर खींच लिया और उसकी जान बचाई .
अपनी प्रकृति, अपना स्वभाव नहीं बदलन चाहिये. किसी की सहायता करते हुए, स्वयं को तकलीफ से बचाने के लिए सावधानी अवश्य बरतनी चाहिये परन्तु अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ना चाहिए.
बूढ़े आदमी ने बहुत शांतिपूर्वक कहा, "बेटा! बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना और मेरा स्वभाव है मदद करना. जब यह बिच्छू अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता तो भला मैं मनुष्य हो कर अपना स्वभाव कैसे छोड़ सकता हूँ?"
फिर बूढ़े आदमी ने क्षण भर के लिए सोचा और पास के पेड़ से एक पत्ता लेकर, बिच्छू को पानी से बाहर खींच लिया और उसकी जान बचाई .
अपनी प्रकृति, अपना स्वभाव नहीं बदलन चाहिये. किसी की सहायता करते हुए, स्वयं को तकलीफ से बचाने के लिए सावधानी अवश्य बरतनी चाहिये परन्तु अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ना चाहिए.
शब्दों का अंतर
एक अंधा लड़का एक इमारत की सीढ़ियों पर बैठा था. उसके पैरों के पास एक टोपी रखी थी. पास ही एक बोर्ड रखा था, जिस पर लिखा था, "मैं अंधा हूँ, मेरी मदद करो." टोपी में केवल कुछ सिक्के थे.
वहां से गुजरता एक आदमी यह देख कर रुका, उसने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकले और टोपी में गिरा दिये. फिर उसने उस बोर्ड को पलट कर कुछ शब्द लिखे और वहां से चला गया. उसने बोर्ड को पलट दिया था जिससे कि लोग वह पढ़ें जो उसने लिखा था.
जल्द ही टोपी को भरनी शुरू हो गई. अधिक से अधिक लोग अब उस अंधे लड़के को पैसे दे रहे थे. दोपहर को बोर्ड बदलने वाला आदमी फिर वहां आया. वह यह देखने के लिए आया था उसके शब्दों का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा? अंधे लड़के ने उसके क़दमों की आहट पहचान ली और पूछा, "आप सुबह मेरे बोर्ड को बदल कर गए थे? आपने बोर्ड पर क्या लिखा था?"
उस आदमी ने कहा मैंने केवल सत्य लिखा था, मैंने तुम्हारी बात को एक अलग तरीके से लिखा, "आज एक खूबसूरत दिन है और मैं इसे नहीं देख सकता."
आपको क्या लगता है? पहले वाले शब्द और बाद वाले शब्द, एक ही बात कह रहे थे?
बेशक दोनों संकेत लोगों को बता रहे थे कि लड़का अंधा था. लेकिन पहला संकेत बस इतना बता रहा था कि वह लड़का अंधा है. जबकि दूसरा संकेत लोगों को यह बता रहा था कि वे कितने भाग्यशाली हैं कि वे अंधे नहीं हैं. क्या दूसरा बोर्ड अधिक प्रभावशाली था?
दोस्तों! यह कहानी हमें बताती है कि, जो कुछ हमारे पास है उसके लिए हमें आभारी होना चाहिए. रचनात्मक रहो. अभिनव रहो. अलग और सकारात्मक सोच रखो. लोगों को अच्छी चीजों की तरफ, समझदारी से आकर्षित करो. जीवन तुम्हे रोने का एक कारण देता है, तो तुम्हारे पास मुस्कुराने के लिए 10 कारण हैं.
वहां से गुजरता एक आदमी यह देख कर रुका, उसने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकले और टोपी में गिरा दिये. फिर उसने उस बोर्ड को पलट कर कुछ शब्द लिखे और वहां से चला गया. उसने बोर्ड को पलट दिया था जिससे कि लोग वह पढ़ें जो उसने लिखा था.
जल्द ही टोपी को भरनी शुरू हो गई. अधिक से अधिक लोग अब उस अंधे लड़के को पैसे दे रहे थे. दोपहर को बोर्ड बदलने वाला आदमी फिर वहां आया. वह यह देखने के लिए आया था उसके शब्दों का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा? अंधे लड़के ने उसके क़दमों की आहट पहचान ली और पूछा, "आप सुबह मेरे बोर्ड को बदल कर गए थे? आपने बोर्ड पर क्या लिखा था?"
उस आदमी ने कहा मैंने केवल सत्य लिखा था, मैंने तुम्हारी बात को एक अलग तरीके से लिखा, "आज एक खूबसूरत दिन है और मैं इसे नहीं देख सकता."
आपको क्या लगता है? पहले वाले शब्द और बाद वाले शब्द, एक ही बात कह रहे थे?
बेशक दोनों संकेत लोगों को बता रहे थे कि लड़का अंधा था. लेकिन पहला संकेत बस इतना बता रहा था कि वह लड़का अंधा है. जबकि दूसरा संकेत लोगों को यह बता रहा था कि वे कितने भाग्यशाली हैं कि वे अंधे नहीं हैं. क्या दूसरा बोर्ड अधिक प्रभावशाली था?
दोस्तों! यह कहानी हमें बताती है कि, जो कुछ हमारे पास है उसके लिए हमें आभारी होना चाहिए. रचनात्मक रहो. अभिनव रहो. अलग और सकारात्मक सोच रखो. लोगों को अच्छी चीजों की तरफ, समझदारी से आकर्षित करो. जीवन तुम्हे रोने का एक कारण देता है, तो तुम्हारे पास मुस्कुराने के लिए 10 कारण हैं.
Wednesday, 13 November 2013
क्या Law of Attraction काम करता है?
क्या "आकर्षण का सिद्धांत" (Law
of Attraction) काम करता है? यह प्रश्न करीब करीब हर उस इंसान के मस्तिष्क में उठता है जो इस को पढता है या
इस पर बनी विडियो देखता है. इसका उत्तर है,
हां यह काम करता है. परन्तु उस प्रकार
नहीं, जिस प्रकार विडियो में दिखाया गया है. विडियो बनाने वाले
लोगों को अपना विडियो बेचना है, इसलिए वह हर चीज़ को बहुत आसान बना कर दिखाते हैं, कि बस आपने केवल सोचना है, कुदरत (इश्वर) को एक मेनू-कार्ड की तरह इस्तेमाल करते हुए
अपना आर्डर देना है और वह, अलादीन के जिन्न की भांति सब कुछ ला कर आपके क़दमों में डाल
देगा. दोस्तों! वास्तविक जिंदगी में ऐसा नहीं होता.
आइये थोड़ा विस्तार से इस पर विचार करते हैं.
सिद्धांत, कुदरत के बनाये एक प्रकार के नियम हैं, जो निरंतर अपना कार्य करते हैं. इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि हम उन
नियमों को जानते हैं या नहीं जानते, उन्हें मानते हैं या नहीं मानते. हमारे मानने या ना मानने
से ये सिद्धांत बदल नहीं जाते, ये अपना कार्य निर्धारित रूप से करते जाते हैं. हम
गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को मानें या ना मानें. ऊंचाई से छलांग लगाने से हम उड़
नहीं जायेंगे, बल्कि नीचे ही गिरेंगे. क्योंकि पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण
के कारण हर वस्तु को अपनी और आकर्षित करती है,
उसे अपने और खींचती है. ठीक उसी प्रकार, जैसे अन्य सिद्धांत अपना कार्य करते हैं. जैसे उर्जा से तरल पदार्थ (liquid), भाफ़ (steam) बन जाता है, ठण्ड से भाफ़ द्रव (liquid) बन जाती है. इसी तरह आकर्षण का सिद्धांत भी अपने नियमों के
अनुसार ही कार्य करता है, चाहे हम उसे मानें या ना मानें.
दोस्तों! हमने देखा कि किस प्रकार प्रकृति के सिद्धांत अपना
कार्य करते हैं? इसी प्रकार "आकर्षण का सिद्धांत" (Law of Attraction) भी अपना कार्य करता है. अब यदि हम चाहें तो इस सिद्धांत को
भी अपने फायदे के लिए प्रयोग कर सकते हैं, जैसे हम अन्य सिद्धांतों को प्रयोग में लाते हैं. आग का
सिद्धांत है जलाना, पर हम इसे खाना पकाने के लिए प्रयोग करते हैं. यही आग यदि
सावधानी पूर्वक प्रयोग ना की जाए तो यह हमें जला भी सकती है. इसी आग की शक्ति से
भाफ़ (steam) बनती है जो बड़े-बड़े जहाज़ों को रेल-इंजनों को चलाती है. यदि
हम सही तरीके से "आकर्षण के सिद्धांत" को प्रयोग में लायेंगे तो उससे
बहुत लाभ उठा सकते हैं, अन्यथा, यही सिद्धांत अपना कार्य करते हुए हमारा अहित भी कर सकता है.
सबसे पहले आती है हमारी सोच. जो हम सोचते हैं वही हम बन
जाते हैं. हमें अपनी सोच सकारात्मक रखनी है. यदि हमारी सोच सकारात्मक है, तो यह सिद्धांत हमें सकारात्मक परिणाम देगा, अन्यथा हमारी
नकारात्मक सोच के चलते भी यह तो अपना कार्य करता ही जाएगा, पर ज़रा सोचिये इस प्रकार हमारा कितना अहित हो सकता है? यदि इस सिद्धांत का प्रयोग ठीक से किया जाए तो 'हम जो चाह सकते
हैं, वह हम पा सकते हैं.'
दोस्तों! दुनिया में दो प्रकार के विश्वास होते हैं. एक है
विश्वास और दूसरा है अंधविश्वास. ईश्वर है,
यह एक विश्वास है परन्तु ईश्वर ही हर
अच्छे बुरे कार्य या परिणाम के लिए उत्तरदायी है, यह अंधविश्वास है.
आकर्षण के सिद्धांत में सबसे पहले यह बताया जाता है कि आपको अपने लक्ष्य लिखने हैं.
यह सच है कि लिखने से कोई भी बात हमारे दिमाग में जल्द और गहराई तक बैठती है और
हमारी सोच को प्रभावित करती है. एक दूसरा तरीका भी इस बात के लिए यह भी बताया जाता
है कि आप अपने लक्ष्यों की तस्वीरें लगा कर एक विज़न-बोर्ड बनाएं. चाहे आप अपने
लक्ष्यों को लिखें या फिर विज़न-बोर्ड बनाएं,
तात्पर्य यह है कि आपके लक्ष्य जितना
अधिक आपके सामने रहेंगे, उतना ही आप उन्हें याद रख पायेंगे. वो कहते हैं न कि, out of sight, out of
mind. प्रतिदिन आपके दिमाग में आने वाले हज़ारों विचारों में,
आपके लक्ष्य कहां खो जायेंगे, पता भी नहीं चलेगा. लिखे हुए
लक्ष्य या विज़न-बोर्ड का कार्य है आपकी इच्छाओं को को ज्वलंत-इच्छाएं (burning
desire) बनाना.
पर यदि आप यह सोचते हैं, कि केवल लिख देने से या विज़न-बोर्ड
बना देने भर से आपको आपके लक्ष्य प्राप्त हो जायेंगे,
तो यह आपका अंध-विश्वास है. आपने देखा होगा कि बहुत से लोग अपने ड्राइंग-रूम
में बड़ी-बड़ी मंहगी कारों के या बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स के चित्र लगाते हैं,
बहुत से हेयर-कटिंग सैलून में भी ऐसी तस्वीरें लगी रहती हैं,
पर बरसों बाद भी ऐसे लोगों के पास वैसी बड़ी-बड़ी मंहगी कारें या बड़ी-बड़ी
बिल्डिंग्स नहीं
आती. तो यह सोचना कि लिखने या विज़न-बोर्ड बनाने मात्र से आपको आपके लक्ष्य प्राप्त
हो जायेंगे, यह अंध-विश्वास है. जहाँ विश्वास आपका
हित-साधक है, वहीँ अन्धविश्वास आपका अहित ही करता है.
जब अपने
लक्ष्यों, अपनी इच्छाओं पर आप पूरा ध्यान
केन्द्रित (focus) करेंगे, आपकी
इच्छाएं burning
desires बन जायेंगी. आपको अपने लक्ष्यों तक पहुँचने के अनेकों
रास्ते नज़र आयेंगे, उन रास्तों पर चलते हुए जब आप
जोश के साथ प्रयत्न करेंगे, तो आपके लिए अपने लक्ष्य प्राप्त
करना आसान हो जाएगा. अर्थात केवल सोचने से या लिखने से आपको आपके लक्ष्य प्राप्त
नहीं होने वाले. अपनी सोच से अपने लक्ष्यों को अपनी इच्छाओं को ज्वलंत इच्छाएं बनाना है और
अपनी कल्पना में अपने लक्ष्यों को पूरा होते देखने का अनुभव (visualise) करना है. तब
बनेंगी आपकी इच्छाएं burning
desires. जब आपकी इच्छाएं burning desires बन जायेंगी,
आगे का रास्ता आपके लिए आसान हो जाएगा. इसमें आपका विश्वास भी बहुत महत्वपूर्ण
पार्ट अदा करता है. यदि आप मन में यही सोचते रहते हैं,
कि यह सिद्धांत काम करेगा या नहीं? यह
आपके अनुसार कार्य नहीं करेगा.
एक और बात भी
यहां सामने आती है, वह है आपकी इच्छाशक्ति. आकर्षण
का सिद्धांत आपकी इच्छाशक्ति को दृढ बनाता है. आपकी इच्छाशक्ति बहुत सी समस्याओं (जैसे
बिमारी, आपसी सम्बन्ध आदि) से निकलने में आपका
बहुत साथ देती है.
इस सिद्धांत को
कैसे प्रयोग करना है? इसके लिए आपको क्या करना है और
क्या नहीं? इसकी चर्चा हम फिर किसी लेख में करेंगे.
अपने सपनों को साकार करने के लिये मेरे आर्टिकल्स पढ़ते
रहिये, अपनी राय मुझे कमेंट्स के माध्यम से भेजते रहिये. तब तक के
लिए शुभ-रात्रि,
good-night, शब्बाखैर. CA बी. एम्. अग्रवाल
बाज़ का अंडा
एक बार किसी बच्चे ने शरारत में, एक बाज़ के अंडे को जंगली मुर्गियों के अंडों के साथ रख दिया.
कुछ दिन बाद अंडों में से चूजे निकल आये. उस बाज़ के अंडे से भी एक बाज़ का बच्चा
निकल आया. वह उन चूजों के साथ ही पलने बढ़ने लगा. उन्ही की तरह व्यवहार करता, उन्ही की तरह आवाजें निकालता, उन्ही की तरह भोजन खोजता और कुछ फुट की उंचाई तक उड़ लेता. उसे लगता था कि वह
भी अन्य मुर्गियों की तरह एक मुर्गी ही है. उसे अपनी असली पहचान पता नहीं थी. अपनी
क्षमताओं से अनजान वह बाज़ स्वयं को एक मुर्गी समझ कर, एक मुर्गी जैसा ही जीवन व्यतीत कर रहा था.
उसने एक दिन, खुले आसमान में शाही शान से एक बाज को उड़ते देखा. उसे बहुत आश्चर्य हुआ. उसने मुर्गियों से पूछा कि, "यह सुंदर पक्षी कौन है?"
मुर्गियों ने कहा "वह एक उत्कृष्ट पक्षी है. वह एक बाज है और ऊंची उड़ान भर सकता है. लेकिन तुम सिर्फ एक जंगली मुर्गी हो अतः तुम
उसकी तरह नहीं उड़ सकते."
उस बाज को इसी बात पर विश्वास हो गया कि वह एक मुर्गी है और वह ऊंची उड़ान भरने में
अक्षम है. बाज़ होते हुए भी उसने एक मुर्गी का जीवन जिया और एक मुर्गी की तरह ही मर
गया क्योंकि अज्ञानता वश उसने स्वयं को अपनी विरासत से वंचित रखा. वह क्या था, और
अज्ञानता एवं परिस्थितियों ने उसे क्या बना दिया?
दोस्तों! यह तो एक बाज़ की कहानी थी. पर क्या
आपको नहीं लगता कि हम में से बहुत से लोग, अपनी
असली सामर्थ्य (capability) से अनजान रहते हुए अज्ञानता-वश, वह सब कुछ नहीं कर पाते जो वह कर सकते हैं. परिस्थितियों-वश
या अन्य कारणों से वे अपनी शक्तियों एवं सामर्थ्य से अनजान होने के कारण, इन शक्तियों एवं सामर्थ्य को साधारण कार्यों में बर्बाद कर
देते हैं. उन्हें पता ही नहीं होता की वह भी एक विजेता बनने के लिए पैदा हुए हैं.
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