Tuesday, 12 November 2013

असफलता, सफलता का राजमार्ग है

सुनने में बात शायद कुछ अटपटी लगे, परन्तु असफलता, सफलता के लिए राजमार्ग (highway) है. टॉम वाटसन सीनियर (इंटरनेशनल बिजनेस मशीन के अध्यक्ष और सीईओ) ने तो यहां तक कहा है कि, "यदि आप सफलता चाहते हैं, तो अपनी असफलता की दर दोगुनी कर दीजिये." यदि हम इतिहास का अध्ययन करें तो हम पायेंगे कि, सफलता की सारी महान कहानियाँ, महान असफलताओं की भी कहानियाँ हैं. लेकिन सफल लोगों की विफलतायें, अक्सर दूसरों को नहीं दिखती. लोगों को तस्वीर का केवल एक पहलू दिखता है, सफलता वाला पहलू, और लोग कहते हैं, "वह व्यक्ति भाग्यशाली रहा होगा. उसे उचित समय पर अवसर मिला होगा." परन्तु सफलता से पहले या बाद में, उस सफल व्यक्ति ने भी अवश्य, कई बार असफलताओं या विफलताओं का मूंह देखा होगा. यहां हम कुछ महान व्यक्तियों की संक्षिप्त कहानियों का उदहारण देखते हैं.

एक 21 साल का व्यक्ति व्यापार में विफल रहा, 22 साल की उम्र में एक विधायी चुनाव हारा, 24 साल की उम्र के कारोबार में फिर से विफल रहा. 26 साल की उम्र में उनकी पत्नी का निधन हो गया, 27 साल की उम्र में उन्हें तंत्रिका-विकार (nervous breakdown) हुआ; 34 साल की उम्र में कांग्रेस का चुनाव हारा, 45 साल की उम्र में एक प्रशासनिक समितीय चुनाव हारा, 47 साल की उम्र में उपाध्यक्ष बनने के प्रयास में विफल रहा, 49 साल की उम्र में एक प्रशासनिक समितीय चुनाव हारा, और 52 साल की उम्र में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए. यह आदमी अब्राहम लिंकन था. क्या आप उसे एक विफलता कहोगे? और कोई होता तो शायद हार मान लेता. लेकिन लिंकन हार मानना शायद सीखा ही नहीं था.

1913 में, triodes ट्यूब के आविष्कारक, ली डी फॉरेस्ट, पर जिले के वकील ने आरोप लगाया कि, फारेस्ट ने जनता को अपनी कम्पनी के शेयर को खरीदने के लिएकपटपूर्ण साधनों का उपयोग कर, गुमराह किया. इस आरोप के साथ उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया. फारेस्ट ने कहा था, कि वह अटलांटिक के पार तक मानव आवाज संचारित कर सकता है. क्या यह असफलता थी? नहीं. ज़रा सोचिये उनके आविष्कार के बिना क्या होता? फारेस्ट को बाद में 'रेडियो के पिता' के रूप में जाना गया. क्या यह विफलता थी?

KFC के कर्नल सैंडर्स को 65 साल की उम्र में 
एहसास हुआ, जो कुछ उनके पास था (एक टूटी कार और 100 डॉलर) वह कुछ भी नहीं था. तभी उन्हें अपनी मां का नुस्खा याद आया और वह उसे बेचने के लिए निकल पड़े. जानते हैं, अपना पहला आर्डर पाने से पहले उन्होंने कितने दरवाजे खटखटाए होंगेअनुमान है कि अपना पहला आर्डर पाने से पहले उन्होंने एक हजार से अधिक दरवाजों पर दस्तक दी थी. अधिकतर लोग दो तीन कोशिशों के बाद हार मान कर बैठ जाते हैं और कहते हैं जो कुछ हम कर सकते हैं, हमने किया.

एक युवा कार्टूनिस्ट के रूप में, वॉल्ट डिज्नी की प्रतिभा को पहचानने से अखबार वालों ने इनकार कर दिया. कई अखबार के संपादकों से उन्हें 
अस्वीकृति (rejections) का सामना करना पड़ा. एक दिन एक चर्च में एक मंत्री ने कुछ कार्टून बनाने के लिए उसे काम पर रखा. डिज्नी चर्च के पास एक छोटे से शेड के बाहर काम कर रहा था. उस शेड में चूहों ने उधम मचा रखा था. एक छोटे चूहे को देख कर डिज्नी को प्रेरणा मिली. यहीं से मिकी-माउस का जन्म हुआ.

एक दिन एक आंशिक रूप से बधिर (deaf), चार साल का बच्चा अपने घर आया तो उसकी जेब में उसके शिक्षक द्वारा लिखा एक नोट था. नोट में लिखा था, "आपका टॉमी मूर्ख है, यह कुछ भी नहीं सीख सकता. इसे स्कूल से निकाल लीजिये." उसकी मां ने पत्र पढ़ा और उत्तर दिया, " मेरा टॉमी मूर्ख नहीं है, मैं उसे अपने आप सिखाऊंगी." और यही टॉमी बड़ा हो कर महान थॉमस एडीसन बना. थॉमस एडीसन की औपचारिक स्कूली शिक्षा केवल तीन महीने की थी और वह आंशिक रूप से बहरा था. 
जब थॉमस एडीसन बल्ब पर काम कर रहा था, वह लगभग 10,000 बार असफल रहा. क्या यह विफलता थी?

हेनरी फोर्ड अपनी पहली कार में रिवर्स गियर बनाना भूल गया. क्या यह विफलता थी?

युवा बीथोवेन से कहा गया कि उसमें संगीत के लिए कोई प्रतिभा नहीं थी, लेकिन वह दुनिया के लिए कुछ सर्वश्रेष्ठ संगीत दे गया.

क्या आप इन लोगों को असफल मानते हैं? वे सब के सब अभावों में रहते हुए, समस्याओं के बावजूद सफल रहे. लोगों को शायद यह लगता हो कि वे भाग्यशाली थे. परन्तु उनकी सफलता का राज था persistence. 

सफलता की सभी कहानियां, महान असफलताओं की कहानियाँ हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि वे लोग विफल रहने पर हार कर नहीं बैठे, अपनी विफलताओं से सबक लेते हुए अपने कार्य में लगे रहे. आप भी अपनी विफलताओं से सीखें और आगे बढ़ें. 

दोस्तों! इंसान जब प्रयत्न करता है तब या तो वह सफल हो जाता है या कुछ सीख जाता है.

कविवर हरिवंश राय बच्चन की कविता की कुछ पंक्तियां यहां उद्धृत करना चाहूँगा:

असफलता एक चुनौती है... स्वीकार करो...
क्या कमी रह गयीदेखो और सुधार करो...
जब तक ना सफल हो नींद-चैन को त्यागो तुम...
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम...
कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती...
हिम्मत करने वालों की कभी हार नही होती... 



अवसर (Opportunity) का चित्र

एक बार एक व्यक्ति एक आर्ट-गैलरी में घूम रहा था. उसने एक अजीब सा चित्र देखा. चित्र किसी मनुष्य का लग रहा था. परन्तु उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था और उसके पंख भी थे. उस व्यक्ति ने वहां खड़े चित्रकार से पुछा की वह विचित्र सा दिखने वाला चित्र किसका है

"अवसर का" चित्रकार ने कहा.

"परन्तु इसका चेहरा बालों से ढका हुआ क्यों है?" उस व्यक्ति ने पूछा.

चित्रकार ने उत्तर दिया, "जब अवसर किसी के सामने आता है, तो वह उसे (अवसर को) पहचान नहीं पाता."

"और यह पंख" उस व्यक्ति ने पुछा.

इस पर चित्रकार ने उस व्यक्ति को पुछा, "क्या तुमने अवसर को किसी की प्रतीक्षा करते देखा है? नहीं ना? अरे भाई ये पंख इस बात को दर्शाते हैं कि यदि हमने समय पर इसे नहीं पहचाना, तो यह हमारी प्रतीक्षा नहीं करेगा और तुरंत उड़ जाएगा."

वह व्यक्ति चित्रकार की बात से बहुत प्रभावित हुआ और उसने वह चित्र खरीद लिया. वह चित्र हर पल उसे याद दिलाता रहता कि उसे जीवन में प्रत्येक अवसर को, ना केवल पहचानना है, बल्कि उसका पूरा लाभ भी उठाना है.

दोस्तों! हम सभी अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुनते है, "मुझे कभी अवसर ही नहीं मिला. अवसर मिलता तो मैं भी यह कर सकता था", आदि आदि. यह सब गलत बातें हैं. यह सब अपनी जिम्मेदारी से भागने और अपनी गलती को छुपाने के बहाने मात्र हैं. हर व्यक्ति के जीवन में अनेकों अवसर (opportunities) आते हैं, पर हम लोग या तो अवसर को पहचानते नहीं, या पहचानने मे देर कर देते हैं, या फिर किसी कारण वश अवसर का लाभ उठाने से चूक जाते हैं और अवसर उड़नछू: हो जाता है. हम में से बहुत से लोग तो केवल बड़े अवसरों की प्रतीक्षा करते रहते हैं और जो अवसर उनके सामने आते भी हैं उन्हें वह छोटा मान कर यूंही गंवा देते हैं. ईश्वर समय-समय पर हर व्यक्ति को अवसर देता है. मित्रो! कोई अवसर बड़ा या छोटा नही होता. अवसर मिले तो उसे गंवाना नहीं चाहिए, उसका लाभ उठाना चाहिए.

Monday, 11 November 2013

सफल होना आसान है

जीवन में हर व्यक्ति सफलता की नई-नई ऊँचाइयों को छूना चाहता है. परन्तु हर व्यक्ति सफल नहीं हो पाता. जानते हैं क्यों? सफलता या असफलता अनेक बातों पर निर्भर करती है. असफल होने के अनेक कारण हैं. कुछ महत्वपूर्ण कारणों की चर्चा हम इस लेख में करेंगे. आप देखेंगे कि सफल होना कितना आसान है.

वो कहते हैं ना कि आप वही बनते हैं, जो आप सोचते हैं. यानि सबसे महत्वपूर्ण बात है आपकी सोच. जैसी सोच होगी, वैसे ही आप बन जायेंगे. अगर आप पर नकारात्मक सोच हावी रहती है, तो निश्चित रूप से आप असफलता को आमंत्रित कर रहे हैं. एक बहुत प्रसिद्द कहावत आपने सुनी होगी, "आ बैल मुझे मार." नकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों पर यह कहावत शत-प्रतिशत चरितार्थ होती है. नकारात्मक सोच के चलते, असफलता रुपी बैल आपको छोड़ने वाला नहीं हैं. अरे भाई जब आप किसी भी बात को या कार्य को नकारात्मक पहलू से देखेंगे तो आपका अवचेतन मन तुरंत आपका समर्थन करेगा और आपकी नकारात्मकता कई गुना बढ़ जायेगी. नकारात्मक सोच के कारण आप आसान से आसान चीज़ों को भी नकारात्मक दृष्टिकोण से ही देखेंगे. उस कार्य को या तो आप शुरू ही नहीं करेंगे और अगर किसी तरह शुरू कर भी लिया तो उसे आधे-अधूरे मन से करेंगे, क्योंकि आपके मन में तो पहले से ही उस कार्य की सफलता को लेकर संदेह है. इस परिस्थिति से बचने का साधारण सा उपाय है, सकारात्मक विचारधारा. सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते और अंततः जीवन के हर क्षेत्र में सफल होते है. यह भी ध्यान रखें की, आपका शरीर आपको हर कार्य को करने के लिए उचित ऊर्जा देता है. एक शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही सकारात्मक सोच का स्वामी हो सकता है. आपने यह कहावत तो सुनी ही होगी, की एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग रहता है (A healthy mind lives in a healthy body). अतः नकारात्मक विचारों से परहेज करते हुए सकारात्मक विचारों को सोचने के लिए अपने आप को ट्रेन करें.

अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी ना चलायें. अर्थात नकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों से दूरी बना कर रहें. यदि आप ऐसे लोगों को टाल नहीं सकते या अपने पास आने से रोक नहीं सकते, तो उनकी बातों पर ध्यान मत दीजिये. क्योंकि ऐसे लोगों की संगति आप को भी ले डूबेगी. यह लोग ना केवल आपकी सारी ऊर्जा नाली में बहा देंगे और व्यर्थ में आपका समय नष्ट करेंगे, बल्कि आपकी सोच को भी नकारात्मक बना कर रहेंगे. महाकवि रहीम ने भी तो कहा है: 


कदली सीप भुजंग मुख, स्‍वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसो ही फल दीन।

अतः नकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों का साथ छोड़ कर, अपनी तरह ही सकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्तियों से सम्बन्ध बढ़ाइए. उनके साथ रहने से आपकी सोच तो सकारात्मक बनी ही रहेगी, साथ-साथ अपनी सोच में आपका विश्वास और भी दृढ होता जाएगा. ऐसे व्यक्तियों का साथ, कदाचित आपका मार्ग दर्शन भी कर सकता है. अगर आपको उचित लगे, तो आप उनकी सफलता की रणनीति को अपना भी सकते हैं.


कुछ समय पहले एक लेख में हमने लक्ष्यों पर चर्चा की थी. आपके लक्ष्यों में लचीलापन (flexibility) भी होना चाहिए. और समय-समय पर आपको अपने लक्ष्यों एवं उन्नति की समीक्षा भी करनी चाहिए. ऐसा करके आप अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में शीघ्र सफल होंगे. समीक्षा करते समय यदि आपको यह लगे की आपके लक्ष्य अधिक ऊंचे या कठोर हैं, तो आप उनमे उचित फेर-बदल कर सकते हैं. इस प्रकार आपकी ऊर्जा एवं आपका समय व्यर्थ में नष्ट होने से बच जाएगा. अपने लक्ष्यों को गंभीरता से लें. यह नहीं कि "मैं यह कार्य करने का प्रयास करूंगा" बल्कि यह सोचें एवं कहें कि "मुझे यह कार्य करना है." 

बहाने बनाना छोड़ दीजिये. आपकी सफलता-असफलता, उन्नति-अवनति के जिम्मेदार आप स्वयं है. अपनी असफलता के समय दूसरों पर या भाग्य पर दोषारोपण मत कीजिये. यह सिर्फ बहानेबाजी की बातें हैं. ऐसी बातें करके आप अपने मन को कुछ समय के लिए बहला सकते हैं. परन्तु जब आप ठन्डे दिमाग से, अपनी असफलता के बारे में समीक्षा करेंगे, आपका मन स्वयं अपना दोष स्वीकार करेगा और आपको बताएगा कि आपके प्रयासों में कहाँ कमी रह गई. अपनी असफलताओं का भी जश्न मनाइए क्योंकि जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सबक असफलता से ही मिलते हैं. इसी प्रकार, अपनी सफलता का सारा श्रेय ईश्वर को मत दीजिये. ईश्वर को धन्यवाद् दीजिये कि, उसने आपको यह कार्य करने की शक्ति दी. इस प्रकार आप बहानेबाजी की बुरी आदत से बचेंगे.

असफलता से डरिये मत, क्योंकि "डर के आगे जीत है." जब आप पूरी लगन एवं सकारात्मक सोच के साथ प्रयास करते हैं, तब या तो आप सफल होते हैं, या कुछ सीखते हैं. आप यदि असफलताओं से डरते हैं तो अमेरिका के राष्ट्रपती अब्राहम लिंकन को याद कीजिये. कितनी असफलताओं के बाद वे अपने देश के राष्ट्रपती बने और उनका कार्यकाल सबसे लम्बे कार्यकालों में से एक था. आज के महानायक अमिताभ बच्चन को याद कीजिये, क्या उन्होंने कभी असफलता का मूंह नहीं देखा? क्या उनकी सारी फ़िल्में बॉक्स-ऑफिस पर सफल रहीं? बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख़ का उदहारण ले लीजिये या फिर सलमान खान का. इंद्रा गांधी का उदहारण लीजिये या अटल बिहारी वाजपेयी का, सबने सफलता एवं असफलता दोनों का ही स्वाद चखा है. असफल हो गए तो चिंता क्या करना, फिर दुगने जोश के साथ प्रयास कीजिये. गिर पड़े हैं, तो पड़े मत रहिये. उठिए और आगे बढिए. किसी मशहूर शायर का यह शेर तो आपने सुना ही होगा:

गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में,
वह तिफ्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलें.

असफलता की ही भांति सफलता को भी गंभीरता से ना लें. हर सफलता की ख़ुशी मनाएं, ईश्वर का धन्यवाद करें और फिर उसे भूल कर आगे बढ़ जाएँ. अन्यथा सफलता की ख़ुशी आपको लापरवाह बना देगी और आप भविष्य की कितनी ही सफलताओं से वंचित रह जायेंगे. 
  
हर दिन, हर पल कुछ नया करने का प्रयास करें. ऐसा करके आप हमेशा जोश में रहेंगे, खुश रहेंगे और कुछ नया करने की चाह आपके लिए सफलता के नये नये द्वार खोलती जायेगी क्योंकि यही मनुष्य का स्वभाव है. पुराने से मन भर जाता है, तब हर कोई, कुछ नया चाहता है. ना ही कभी पूर्णता (
perfection) का इंतज़ार करें. कोई भी चीज़ या कार्य कभी perfect नहीं हो सकता क्योंकि even the best can be improved.

अब सबसे महत्वपूर्ण बात. वह है क्रियान्वन (action). जब तक आप अपने विचारों को अमली जामा नहीं पहनाते अर्थात उनको (implement) नहीं करते, तब तक सब बेकार है. 

दोस्तों! उपरोक्त बातों को ध्यान में रख कर कोई भी कार्य करने से, मैं आपकी की तो गारंटी नहीं ले सकता, पर आपको इतना विश्वास अवश्य दिलाता हूँ कि यह आसान उपाय आपकी सफलता की संभावना कई गुना बाधा देंगे.

अपने सपनों को साकार करने के लिये मेरे आर्टिकल्स पढ़ते रहियेअपनी राय मुझे कमेंट्स के माध्यम से भेजते रहिये. तब तक के लिए शुभ-रात्रि, good-night, शब्बाखैर. CA बी. एम्. अग्रवाल


गुड़िया और सफ़ेद गुलाब

एक शॉपिंग मॉल में कैशियर के पास एक 5 - 6 साल का बच्चा खड़ा था. उसके हाथ में एक सुन्दर गुड़िया थी जिसे वह खरीदना चाहता था. कैशियर ने बच्चे का पर्स देखते हुए बच्चे से कहा, "आपके पास इस गुड़िया को खरीदने के लिए पर्याप्त (enough) पैसा नहीं है." फिर बच्चे ने खजांची को पूछा, क्या आपको यकीन है कि मेरे पर्स में पर्याप्त पैसा नहीं है?''

कैशियर ने एक बार फिर से नकदी की गिनती की और कहा, ''सॉरी! पर आप के पास गुड़िया खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है." बच्चा अभी भी हाथ में गुड़िया पकड़े हुए था. वहीँ मॉल में घूमते एक सज्जन ने यह सब देखा और बच्चे के पास आये. उन्होंने बच्चे से पूछा कि वह गुड़िया किसे देना चाहता था. "यह गुड़िया मेरी बहन को बहुत अच्छी लगी थी और वह इसे लेना चाहती थी. मैं उसके जन्मदिन के उपहार के रूप में उसे यह गुड़िया देना चाहता था. मेरी बहन भगवान के पास चली गई है. अब मैं यह गुड़िया अपनी माँ को देना चाहता हूँ, जिससे की वे यह गुड़िया मेरी बहन को दे सकें. मेरे पापा कहते हैं कि मेरी माँ भी बहुत जल्द भगवान के पास चली जाएगी." यह सब कहते हुए बच्चा बहुत उदास हो गया.

उन सज्जन को लगा उनके दिल के धड़कन रुक जायेगी. बच्चे ने उनकी तरफ देखते हुए कहा अंकल, "मैं पापा से कह कर आया हूँ, की वह माँ से मेरे वापस जाने तक माँ को रोके रखें." फिर उसने अपना एक हँसता हुआ फोटो उन सज्जन को दिखाया और कहा, "अपना यह फोटो भी मैं माँ के साथ, अपनी बहन को भेजना चाहता हूँ जिससे की वह मुझे याद रख सके. अंकल मैं अपनी माँ को भी बहुत प्यार करता हूँ और चाहता हूँ कि वह कभी भी मुझे छोड़ कर ना जाएँ. परन्तु पापा कहते हैं कि, माँ को मेरी बहन के साथ रहने के लिए भगवान के पास जाना होगा, क्योंकि मेरी बहन अभी बहुत छोटी है." कहने के बाद बहुत उदास आँखों से बच्चे ने गुड़िया को देखा.

वह सज्जन अवाक् (shocked) से यह सब सुनते रहे. वह अब तक सोच चुके थे कि उन्हें क्या करना है. उन्होंने कैशियर से बच्चे का पर्स लेते हुए कहा, "एक बार फिर से देखते हैं, तुम्हारे पास पूरे पैसे हैं या नहीं?" इसी बीच उन सज्जन ने, चुपके से, अपने कुछ पैसे बच्चे के पैसों में मिला दिए." 'ठीक है' बच्चा बोला.

अब उन सज्जन ने पैसे गिने तो वह गुड़िया की कीमत से ज्यादा थे. बच्चा बहुत खुश हो गया.

आसमान की और देखते हुए बच्चे ने कहा, "मुझे काफी पैसा देने के लिए शुक्रिया भगवान! अब मैं गुडिया के साथ साथ माँ के लिए सफ़ेद गुलाब भी खरीद सकूंगा. मेरी माँ को सफ़ेद गुलाब बहुत पसंद हैं." फिर उसने उन सज्जन की और देखते हुए कहा, "अंकल कल रात सोने से पहले मैंने भगवान से कहा था, कि वह मुझे गुड़िया के लिए पूरे पैसे देदे. ताकि मैं माँ के साथ बहन के लिए गुड़िया भेज सकूं. मैंने सफ़ेद गुलाब के लिए पैसे नहीं मांगे थे. वरना भगवान् मुझे लालची समझते." 

गुड़िया और सफ़ेद गुलाब ले कर वह बच्चा चला गया. उन सज्जन को याद आया, सुबह ही उन्होंने अखबार में पढ़ा था कि एक शराबी ट्रक ड्राईवर ने एक कार को टक्कर मार दी. कार में एक युवा महिला के साथ एक छोटी बच्ची थी. बच्ची की दुर्घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई थी और महिला गंभीर रूप से घायल, हॉस्पिटल में है. उन्हें लगा कि वह खबर उस बच्चे की ही माँ और बहन के बारे में ही है. 

अगले दिन अखबार में उस महिला के निधन का समाचार छपा था. वह सज्जन स्वयं को रोक नहीं पाए और सफ़ेद गुलाब का एक बुके ले कर उस महिला को श्रद्धांजलि देने चले गए. 

उस बच्चे की फोटो और गुड़िया उस महिला की छाती पर रखी थी. हाथ में एक सुंदर सफेद गुलाब पकड़े, महिला का शव ताबूत में था. महिला को श्रद्धांजलि दे करआंसू भरी आंखों के साथ वह सज्जन वहाँ से चले गए. कितना प्यार था उस बच्चे के दिल में अपनी माँ और बहन के लिए. इसका अंदाज़ा लगाना भी उनके लिए मुश्किल था, पर साथ ही उस अनजान 'शराबी ट्रक-ड्राईवर' के लिए बेहिसाब गुस्सा एवं घृणा थी. एक हँसता-खेलता परिवार देखते-देखते उस शराबी ड्राईवर के कारण उजड़ गया था.

कृपया शराब पी कर गाड़ी ना चलायें.


पिता से प्रेरणा

यह दो भाइयों की कहानी है. एक भाई नशेड़ी शराबी था और अक्सर अपने परिवार के साथ मारपीट करता था. वहीँ दूसरा भाई समाज का एक सम्मानित व्यक्ति, अपने परिवार का प्रिय और बहुत ही सफल व्यवसायी था. 

लोगों को आश्चर्य होता कि, एक ही माता पिता की संतान, एक ही वातावरण में पले-बढे यह दोनों भाई इतने अलग कैसे हो सकते हैं? पता लगाना चाहिए. 

पहले भाई से पूछा गया, "आप ऐसा क्यों करते हैं? आप एक नशेड़ी शराबी हैं और अपने परिवार वालों से मार-पीट करते हैं. आपको ऐसा करने की प्रेरणा कहां से मिलती है?" 

उसने कहा, "मेरे पिता से. मेरे पिता एक नशेड़ी थे, शराब के नशे में वह अपने परिवार को मारते-पीटते थे. तुम मुझसे कैसा होने की उम्मीद करते हो? मेरा बाप भी ऐसा करता था. मुझे पूछते हो कि मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ ?" 

अब वे दुसरे भाई के पास गये, जो सब कुछ सही कर रहा था, और उसे एक सवाल पूछा, "आप कैसे सब कुछ सही कर रहे हैं? आपकी प्रेरणा का स्रोत क्या है?" 

और जानते हैं उसने क्या उत्तर दिया? "मेरे पिता मेरी प्रेरणा का स्रोत हैं. मैं एक छोटा बच्चा था, मैं अपने पिता को शराब पीते और सब गलत बातें करते देखा करता था. मैंने मन बना लिया कि मुझे ऐसा नहीं बनना है."

दोस्तों! दोनों भाइयों की प्रेरणा का स्रोत एक ही व्यक्ति था, लेकिन एक भाई ने नकारात्मक प्रेरणा ली जब कि दूसरे ने सकारात्मक प्रेरणा. 
नकारात्मक प्रेरणा आसान रास्ते पर चलने की इच्छा जगाती है परन्तु उसका परिणाम सदैव दुखद होता है.

Saturday, 9 November 2013

जान जाये, मूगंफली ना जाये

बंदर पकड़ने वाले, एक ख़ास तरह का बॉक्स प्रयोग करते हैं. बॉक्स के ऊपर, केवल इतना बड़ा एक छेद होता है, जिसमें से बन्दर अपना हाथ अंदर डाल सके. बॉक्स के अन्दर मूंगफलियाँ रखी जाती हैं. मूंगफलियों के लालच में बन्दर उस छेद से अपना हाथ बॉक्स के अन्दर डालता है और मूंगफलियों की मुट्ठी भर लेता है. बॉक्स का छेद बन्दर के हाथ डालने या निकालने के लिए काफी होता है परन्तु मुट्ठी के लिए नहीं. बन्दर अपना हाथ बाहर खींचना चाहता है, पर लालच में अपनी मुट्ठी नहीं खोलता. और परिणाम ? लालच में बन्दर पकड़ा जाता है.

हममें से बहुत सारे लोग भी इस बन्दर की भांति ही आचरण करते हैं. हम अपने पूर्वाग्रहों, अपने अंधविश्वासों, मिथ्या धारणाओं रुपी मूंगफलियों को चाह कर भी छोड़ नहीं पाते और अपनी इस असफलता को छिपाने के लिए, दूसरों के साथ-साथ अपने आप से भी तरह तरह के झूठे बहाने बनाने लगते है, "मैं इसलिए ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि........मैं इस वजह से ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि........" और मूंगफलियों की भांति यह 'क्योंकि' हमें जकड़े रखता है और आगे नहीं बढ़ने देता. 

एक बार इस 'क्योंकि' से छुटकारा पा कर देखिये. सफल व्यक्ति अपने बन्धनों को तर्कसंगत नहीं ठहराते. सारे बंधन, बेड़ियाँ और जंजीरें तोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं. केवल दो चीज़ें, किसी व्यक्ति की सफलता निर्धारित करती हैं, और यह दो चीज़ें हैं कर्म और कर्म-प्रभाव (action and reaction).

दोस्तों! कारण का महत्त्व नहीं है. यदि कुछ महत्वपूर्ण है, तो वह है 'परिणाम' (result).

तोल मोल के बोल

एक बार की बात है. एक बूढ़ा आदमी अपने पड़ोसी युवक के बारे में अफवाहें फैलाता था की वह युवक एक चोर है. नतीजतन, युवक को गिरफ्तार कर लिया गया. कुछ दिन बाद युवक निर्दोष साबित हो गया था और रिहा कर दिया गया. रिहा होने के बाद उसने उस बूढ़े आदमी पर आरोप लगाया कि वह बूढ़ा गलत अफवाहें फैलाता है और उस पर मुकदमा कर दिया.

अदालत में बूढ़े आदमी ने जज को बताया, "वे सिर्फ टिप्पणी (comments) थी. मेरा इरादा किसी को भी नुकसान पहुँचाने का नहीं था." न्यायाधीश ने बूढ़े आदमी से कहा, "आप एक कागज वह सब बातें लिखिए जो आप उसके बारे में कहा करते थे. उस कागज़ के टुकड़े करके रास्ते में फेंकते हुवे अपने घर चले जाएँ और कल फैसला सुनने के लिए आयें." उस बूढ़े आदमी ने वैसा ही किया.

अगले दिन, न्यायाधीश ने बूढ़े आदमी से कहा, "फैसला सुनने से पहले, तुम बाहर जाओ और कल जो कागज़ के टुकड़े बाहर फेंक दिये थे, उन सभी टुकड़ों को इकट्ठा करके ले आओ."

बूढ़े आदमी ने कहा, "मैं ऐसा नहीं कर सकता! 
हवा उन्हें उड़ा कर जाने कहाँ-कहाँ फैला गई. उन्हें खोजने के लिए अब मैं कहाँ जाऊँगा?"

न्यायाधीश ने फिर कहा: "इसी तरह से तुम्हारी गलत टिप्पणी (comments) ने भी इस हद इस आदमी के सम्मान को नष्ट कर दिया कि अब उसे सुधारना आसान नहीं है. 
आप किसी के बारे में अच्छी बात नहीं कर सकते तो बेहतर है कुछ मत कहो." इसके बाद न्यायाधीश ने बूढ़े आदमी को उचित सजा दी.
दोस्तों! हमें अपने शब्दों का स्वामि बनना है, दास नहीं. वो कहते हैं ना, "पहले तोलो फिर बोलो"